ऐतिहासिक धरोहर बनी कबाड़खाना, ठेकेदारों की निजी पार्किंग में बदला सूचना केंद्र नगर निगम की उदासीनता से सरकारी जमीन पर बढ़ते कब्जे, बच्चों के पार्क उजड़े।
By Shubh Bhaskar ·
18 May 2026 ·
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ऐतिहासिक धरोहर बनी कबाड़खाना, ठेकेदारों की निजी पार्किंग में बदला सूचना केंद्र
नगर निगम की उदासीनता से सरकारी जमीन पर बढ़ते कब्जे, बच्चों के पार्क उजड़े।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- अलवर- अलवर शहर की ऐतिहासिक और सरकारी धरोहरें अब बदहाली और अव्यवस्था की भेंट चढ़ती नजर आ रही हैं। शहर के बीचों-बीच कंपनी बाग और शहीद स्मारक के सामने स्थित सूचना केंद्र, जो कभी अपनी सुंदरता और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता था, आज ठेकेदारों की निजी पार्किंग बनकर रह गया है।
सरकारी आयोजनों और राष्ट्रीय पर्वों पर प्रशासन द्वारा सजाया जाने वाला सूचना केंद्र अब कचरा उठाने वाली गाड़ियों के ठेकेदारों के निजी वाहनों से घिरा दिखाई देता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर निगम और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत के चलते सरकारी जमीन का दुरुपयोग खुलेआम हो रहा है। नियमों के अनुसार यहां केवल नगर निगम की अधिकृत गाड़ियां ही खड़ी हो सकती हैं, लेकिन वर्षों से निजी ठेकेदार इस स्थान का उपयोग अपने फायदे के लिए कर रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों ने बताया कि सूचना केंद्र के पास बने एक मैरिज होम का उपयोग भी लंबे समय तक एक ठेकेदार द्वारा बिना किसी शुल्क के निजी वाहनों की पार्किंग के रूप में किया गया। मामला समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के बाद अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत सामने तो आई, लेकिन कार्यवाही के नाम पर कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
स्थिति अब इतनी खराब हो चुकी है कि सूचना केंद्र परिसर में बना पार्क और वहां स्थापित पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा भी उपेक्षा का शिकार हो गई है। कभी बच्चों और परिवारों के आकर्षण का केंद्र रहा यह स्थान अब कबाड़ और भारी वाहनों के बीच अपनी पहचान खोता जा रहा है।
शहरवासियों ने आरोप लगाया कि कंपनी बाग के सामने प्रस्तावित चौपाटी परियोजना को भी कुछ प्रभावशाली लोगों के दबाव में रोक दिया गया। लोगों का कहना है कि यह स्थान चौपाटी के लिए सबसे उपयुक्त था, लेकिन आसपास संचालित मैरिज होमों को पार्किंग की समस्या होने के डर से आपत्तियां लगाई गईं और योजना ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अलवर में विकास कार्य अब जनता की जरूरतों से ज्यादा ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत से प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी संपत्तियों पर बढ़ते निजी कब्जे और बच्चों के पार्कों की बदहाली प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।