चुनाव आते ही जागने वाले नेता और दिखावटी विकास की सियासत।
By Shubh Bhaskar ·
12 Jan 2026 ·
32 views
चुनाव आते ही जागने वाले नेता और दिखावटी विकास की सियासत।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- माचाड़ी- चुनाव आते ही कई नेता अचानक सक्रिय हो जाते हैं। जो चेहरे वर्षों तक जनता की समस्याओं से दूर रहे, वही चुनावी मौसम में गांव-गांव और गली-गली नजर आने लगते हैं। हाथ जोड़कर वादे किए जाते हैं, विकास के बड़े-बड़े दावे होते हैं, लेकिन मतदान समाप्त होते ही वही नेता फिर से गायब हो जाते हैं।
चुनाव के समय सक्रिय होने वाले और बाद में अदृश्य हो जाने वाले नेताओं का उद्देश्य विकास नहीं, बल्कि केवल चुनावी ड्रामा होता है। जनता अब वादों से नहीं, काम के आधार पर वोट देने का मन बना रही है। यह पंक्तियां आज की चुनावी राजनीति की सच्चाई को उजागर करती हैं।
आज विकास की परिभाषा ही बदल दी गई है। कहीं अधूरी सड़क का उद्घाटन, कहीं वर्षों पुरानी योजना को नया रंग, तो कहीं जनता के पैसों से लगाए गए पोस्टरों में विकास की तस्वीर दिखाई जाती है। असल सवाल यह है कि क्या चुनाव के बाद भी वही सक्रियता बनी रहती है? ज़्यादातर मामलों में जवाब साफ है—नहीं।
ग्रामीण इलाकों में आज भी पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार जैसी बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। लेकिन चुनाव आते ही इन्हीं मुद्दों को हथियार बनाकर वोट मांगे जाते हैं। जनता की मजबूरी को राजनीतिक लाभ में बदला जाता है।
नेता चुनाव से पहले जनता की चौखट पर पहुंचते हैं, लेकिन जीत के बाद वही जनता कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हो जाती है। जो प्रतिनिधि पांच साल तक जनता के बीच नहीं रहे, वे अचानक चुनाव के समय जनसेवक बनने का नाटक करते हैं।
अब हालात बदल रहे हैं। जनता पहले से अधिक जागरूक हो रही है। सोशल मीडिया, स्थानीय समाचार और ज़मीनी हकीकत ने लोगों को यह समझा दिया है कि कौन नेता सिर्फ भाषण देता है और कौन वास्तव में काम करता है। अब सवाल पूछे जा रहे हैं—
पिछले कार्यकाल में क्या किया?
विकास कागजों में हुआ या ज़मीन पर?
आज ज़रूरत है ऐसे नेताओं को मुंहतोड़ जवाब देने की, जो केवल चुनाव के समय जनता को याद करते हैं। अब वोट भावनाओं पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और काम के रिपोर्ट कार्ड पर मिलेगा।
*निष्कर्ष*
लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है। जब जनता दिखावटी विकास और असली काम में फर्क करेगी, तभी चुनावी सियासत बदलेगी। अब चुनाव केवल जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि गायब रहने वाले नेताओं से हिसाब लेने का समय है।