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पेपर लीक माफिया के आगे बेबस कानून, परीक्षा या छलावा?

By Shubh Bhaskar · 23 Jul 2026 · 11 views
पेपर लीक माफिया के आगे बेबस कानून, परीक्षा या छलावा?

*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*

(माचाड़ीअलवर):-जयपुर- देश में शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। विभिन्न राज्यों में छात्र, अभिभावक,शिक्षक, सामाजिक संगठन तथा कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी आवाज उठा रहे हैं। हाल के विरोध प्रदर्शनों और संसद मार्च के दौरान पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटनाएं भी सामने आई हैं।
इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए *डॉ.सुरेश शर्मा* ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाब देही सुनिश्चित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनका कहना है कि लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों ने लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा का बढ़ता खर्च और परीक्षा प्रणाली में बार-बार सामने आने वाली अनियमितताएं छात्रों में मानसिक तनाव पैदा कर रही हैं।
*डॉ. शर्मा* का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति या संगठन परीक्षा सुधार, पेपर लीक पर रोक,पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करता है, तो सरकार को आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित कर उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रतिनिधियों से बातचीत कर उचित आश्वासन दिया जाता, तो आंदोलन इतना व्यापक रूप नहीं लेता।
उन्होंने यह भी कहा कि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं से प्रभावित छात्रों और उनके परिवारों के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप व्यवहारिक एवं कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया।
*डॉ.शर्मा* ने कहा कि पेपर लीक और परीक्षा में धांधली जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए पूरे देश में एक समान, सख्त और प्रभावी केंद्रीय कानून बनाया जाना चाहिए, ताकि दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही हो सके और परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित एवं पारदर्शी बनाया जा सके। उन्होंने सुझाव दिया कि इस गंभीर विषय पर संसद में व्यापक चर्चा हो तथा सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाए।
उन्होंने अंत में कहा कि शिक्षा और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी पक्षों को मिलकर समाधान खोजने की आवश्यकता है। लोकतंत्र की भावना भी यही है कि संवाद, संवेदनशीलता और आपसी सम्मान के आधार पर जनहित के मुद्दों का समाधान किया जाए।

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