पत्रकारों की सबसे बड़ी चुनौती: आपसी एकता का अभाव। पत्रकारिता में बढ़ती गुटबाजी और प्रतिस्पर्धा के बीच एकजुटता की जरूरत पर उठे सवाल।
By Shubh Bhaskar ·
02 Jul 2026 ·
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पत्रकारों की सबसे बड़ी चुनौती: आपसी एकता का अभाव।
पत्रकारिता में बढ़ती गुटबाजी और प्रतिस्पर्धा के बीच एकजुटता की जरूरत पर उठे सवाल।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):-अलवर- पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन आज इस स्तंभ की मजबूती को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। अक्सर देखा जाता है कि किसी पत्रकार के साथ अभद्रता, अन्याय या हमला होने की स्थिति में पत्रकार समाज एकजुट होकर उसके समर्थन में खड़ा नहीं हो पाता। ऐसे में पत्रकारों के बीच आपसी एकता का अभाव एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
जानकारों का मानना है कि अन्य पेशों की तुलना में पत्रकारों को आपसी सहयोग और संगठन की भावना को और मजबूत करने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी अधिवक्ता के साथ कोई विवाद होता है तो बड़ी संख्या में वकील उसके समर्थन में खड़े नजर आते हैं। मामले का निर्णय न्यायालय करता है, लेकिन अपने पेशे के सम्मान और साथी के प्रति एकजुटता उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
इसके विपरीत, पत्रकारिता के क्षेत्र में कई बार सहयोग के बजाय गुटबाजी,व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या और एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कई बार साथी पत्रकार की उपलब्धियों से प्रेरणा लेने के बजाय उसे कमतर साबित करने की कोशिश की जाती है,जिससे पूरे पत्रकार समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन इसका अर्थ आपसी विरोध या दुश्मनी नहीं होना चाहिए। यदि पत्रकार अपने सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों के मुद्दों पर एकजुट होकर आवाज उठाएं,तो उनकी बात अधिक प्रभावी ढंग से समाज और शासन-प्रशासन तक पहुंच सकती है।
पत्रकार समाज के हर वर्ग की समस्याओं को प्रमुखता से उठाता है। ऐसे में समय की मांग है कि पत्रकार अपने साथियों के हितों और सम्मान की रक्षा के लिए भी समान संवेदनशीलता और एकजुटता का परिचय दें। माना जा रहा है कि जिस दिन पत्रकार व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर संगठन और पेशे के हित को प्राथमिकता देंगे, उसी दिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता और सामाजिक प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा।