मनुस्मृति को लेकर अभद्र टिप्पणियों पर रोक लगाने की मांग – *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*
By Shubh Bhaskar ·
29 Jun 2026 ·
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मनुस्मृति को लेकर अभद्र टिप्पणियों पर रोक लगाने की मांग – *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- जयपुर- सर्व समाज जागृति संघ के संस्थापक अध्यक्ष व अन्य संगठनों से के सर्वोच्च पदों पर जुड़े *डॉ. सुरेश चंद शर्मा* ने मनुस्मृति को लेकर सार्वजनिक मंचों और टीवी बहसों में की जाने वाली अभद्र टिप्पणियों पर रोक लगाने की मांग की है।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि मनुस्मृति प्राचीन भारतीय समाज,धर्म,कानून और आचार-विचार से संबंधित एक महत्वपूर्ण धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है। उनके अनुसार इसमें समाज व्यवस्था,चार वर्ण,चार आश्रम, संस्कार,पारिवारिक दायित्व, शासन व्यवस्था,न्याय,दंड व्यवस्था तथा सामाजिक जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों का उल्लेख मिलता है।उन्होंने कहा कि पारंपरिक विद्वानों के अनुसार इसके अनेक नियम तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाए गए थे।
उन्होंने यह भी कहा कि मनुस्मृति को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं रही हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे सामाजिक असमानता और भेदभाव का प्रतीक माना था तथा 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति दहन आंदोलन का नेतृत्व किया था। वहीं अनेक विद्वान इसे ऐतिहासिक और धर्मशास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण ग्रंथ मानते हैं।
*डॉ. शर्मा* का आरोप है कि कुछ टीवी चैनल और सोशल मीडिया मंच मनुस्मृति से जुड़े विवादों को टीआरपी और राजनीतिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से बार-बार उठाते हैं,जिससे समाज में अनावश्यक तनाव और वैमनस्य का वातावरण बनता है।
उन्होंने कहा कि मनुस्मृति को लगभग दो हजार वर्ष पुरानी सामाजिक व्यवस्था के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में देखा जाना चाहिए। प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या वर्तमान संवैधानिक मूल्यों और ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि अधूरी जानकारी या चुनिंदा श्लोकों के आधार पर किसी भी समुदाय के प्रति नफरत या तनाव फैलाने से बचें।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि वर्तमान समय में भारत का संविधान सर्वोच्च है और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार एवं कर्तव्य सुनिश्चित करता है। उन्होंने सामाजिक संगठनों से अपील की कि यदि किसी टीवी बहस या सोशल मीडिया सामग्री के माध्यम से समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया जाता है, तो उसकी शिकायत संबंधित सक्षम प्राधिकरणों के समक्ष की जाए। उन्होंने न्यायपालिका से भी समाज में जातीय या वर्गीय विद्वेष फैलाने वाले मामलों पर आवश्यकतानुसार संज्ञान लेने की मांग की।