बासोड़ा किस लिए मनाया जाता है, गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने दी जानकारी।
By Shubh Bhaskar ·
09 Mar 2026 ·
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बासोड़ा किस लिए मनाया जाता है, गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने दी जानकारी।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर) मथुरा- ब्रजवासी गौ रक्षक सेना भारत संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने बासोड़ा पर्व के महत्व के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह पर्व माता शीतला की आराधना के लिए मनाया जाता है। इस दिन माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और श्रद्धालु ठंडे भोजन का सेवन करते हैं।
उन्होंने बताया कि प्रत्येक वर्ष चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला अष्टमी आती है, जिसे कई स्थानों पर बासोड़ा भी कहा जाता है। इस दिन माता शीतला की पूजा-अर्चना करने के साथ उनकी कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
शीतला माता की कथा
धर्म दास महाराज के अनुसार प्राचीन कथा के अनुसार एक गांव में एक ब्राह्मण दंपति रहता था, जिनके दो पुत्र और दो बहुएं थीं। दोनों बहुओं को लंबे समय बाद पुत्र प्राप्त हुए थे। इसी दौरान शीतला अष्टमी का पर्व आया, जिसमें परंपरा के अनुसार ठंडा भोजन बनाया और खाया जाता है।
लेकिन दोनों बहुओं को डर था कि ठंडा भोजन खाने से कहीं वे या उनके छोटे बच्चे बीमार न पड़ जाएं। इसलिए उन्होंने चुपचाप पशुओं के दाने के बर्तन में दो गरम बाटियां बनाकर रख दीं। पूजा के बाद दोनों बहुएं वहां से लौटकर आईं और छिपकर गरम बाटियां खा लीं, जबकि घर में सभी लोगों ने ठंडा भोजन किया।
कुछ समय बाद जब बहुएं अपने बच्चों को उठाने गईं तो उन्होंने देखा कि दोनों बच्चे मृत पड़े हैं। यह देखकर वे व्याकुल हो गईं। जब सास को यह बात पता चली तो उसने कहा कि यह माता शीतला की अवहेलना का परिणाम है और उन्हें बच्चों को जीवित कराकर ही घर लौटने को कहा।
दोनों बहुएं अपने मृत बच्चों को लेकर भटकती हुई एक खेजड़ी के वृक्ष के पास पहुंचीं। वहां दो देवियां बैठी थीं, जिनके बालों में जुएं थीं। बहुओं ने सेवा भाव से उनके सिर से जुएं निकालकर उन्हें राहत दी। इससे प्रसन्न होकर देवियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
तभी उन्हें ज्ञात हुआ कि वे स्वयं माता शीतला थीं। बहुओं ने अपनी गलती स्वीकार कर उनसे क्षमा मांगी। उनकी विनती सुनकर माता शीतला प्रसन्न हुईं और दोनों बच्चों को पुनः जीवित कर दिया।
पर्व का संदेश
गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने कहा कि इस कथा का संदेश है कि परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए। माता शीतला की पूजा श्रद्धा और नियमों के साथ करने से परिवार में सुख, शांति और स्वास्थ्य बना रहता है।
उन्होंने कहा कि वे गौ माता की कृपा से समय-समय पर धार्मिक और आध्यात्मिक कथाएं लिखते रहते हैं।
“साथ देती नहीं है किसी का, क्या भरोसा है इस जिंदगी का, जो सत्य है उसे कोई टाल नहीं सकता।