सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दों पर बढ़ी राजनीतिक चर्चा, विभिन्न दलों की चुप्पी पर उठे सवाल!
By Shubh Bhaskar ·
19 Feb 2026 ·
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सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दों पर बढ़ी राजनीतिक चर्चा, विभिन्न दलों की चुप्पी पर उठे सवाल!
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- नई दिल्ली- देशभर में इन दिनों सवर्ण समाज की जनसंख्या और राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस तेज हो गई है। आम चर्चा में यह बात कही जा रही है कि सवर्ण समाज की आबादी लगभग ०3 प्रतिशत है। विपक्षी दलों द्वारा दिए गए ऐसे बयानों ने राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी है, वहीं सोशल मीडिया पर भी इस विषय को लेकर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए यूजीसी के एक नियम को लेकर भी कुछ संगठनों और वर्गों में असंतोष की स्थिति बनी है। इसे लेकर विभिन्न स्थानों पर विरोध के स्वर उठे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली — में अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है।
विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा इस विषय पर संतुलित और सीमित बयान दिए जा रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इससे राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएँ चल रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सवर्ण समाज का चुनावी प्रभाव संख्या से अधिक राजनीतिक दिशा तय करने में रहा है।
सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक मंचों पर सवर्ण समाज के सामने दो विकल्पों की चर्चा की जा रही है— पहला, पारंपरिक समर्थन जारी रखते हुए अपनी राजनीतिक भूमिका को बनाए रखना; और दूसरा, चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग कर प्रभावशाली संदेश देना। इन चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि किसी भी वर्ग की राजनीतिक उपेक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में प्रत्येक मतदाता और प्रत्येक वर्ग का महत्व समान होता है। चुनावी राजनीति में किसी भी समुदाय के प्रभाव को केवल प्रतिशत के आधार पर आंकना उचित नहीं माना जाता। आगामी चुनावों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस किस दिशा में जाती है और विभिन्न राजनीतिक दल इस पर क्या स्पष्ट रुख अपनाते हैं।
लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदाता के हाथ में होता है, और मताधिकार का प्रयोग ही किसी भी वर्ग की वास्तविक ताकत को दर्शाता है।