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77वां गणतंत्र दिवस विशेष: गांधी की विचारधारा और आज के भारत की दिशा*

By Shubh Bhaskar · 25 Jan 2026 · 20 views
*77वां गणतंत्र दिवस विशेष: गांधी की विचारधारा और आज के भारत की दिशा*

गजेंद्र मालवीय बिछीवाड़ा उदयपुर
दैनिक शुभ भास्कर राजस्थान 26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह अवसर केवल राष्ट्रीय उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी है। हर वर्ष यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि विचारों, मूल्यों और संवैधानिक संकल्पों से बना राष्ट्र है। जब देश तिरंगे की छाया में संविधान के प्रति निष्ठा दोहराता है, तब यह प्रश्न स्वतः सामने आता है कि क्या हम उस भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जिसकी कल्पना स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने की थी।
इस प्रश्न के केंद्र में आज भी महात्मा गांधी खड़े दिखाई देते हैं। गांधी केवल स्वतंत्रता संग्राम के नायक नहीं थे, बल्कि वे आज़ाद भारत के नैतिक वास्तुकार भी थे। उन्होंने बार-बार कहा था कि स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य तब है, जब वह समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक सम्मान और अधिकार पहुँचाए। उनके लिए गणतंत्र का अर्थ केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी था।
गांधी का सपना ऐसा भारत था, जहाँ सत्ता भय से नहीं, विश्वास से चले। वे मानते थे कि किसी भी लोकतंत्र की मजबूती उसके नागरिकों के चरित्र से तय होती है। आज जब राजनीति में शब्दों की कठोरता और व्यवहार की असहिष्णुता बढ़ती दिखाई देती है, तब गांधी का यह विश्वास और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने सिखाया कि सत्ता का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, न कि वर्चस्व।
धर्म के विषय में गांधी का दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट और संतुलित था। वे स्वयं आस्थावान थे, लेकिन उतनी ही दृढ़ता से यह मानते थे कि राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि धर्म व्यक्ति को नैतिक बनाता है, लेकिन जब वही धर्म राजनीति का हथियार बन जाए, तो वह समाज को विभाजित कर देता है। भारतीय संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता इसी सोच का परिणाम है, जिसमें हर नागरिक को अपनी आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन राज्य सभी के साथ समान व्यवहार करता है।
गांधी सामाजिक समानता के बिना स्वतंत्रता को अधूरा मानते थे। उन्होंने जाति, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। उनका यह कहना कि यदि बहुमत भी अन्याय के पक्ष में हो, तब भी लोकतांत्रिक राज्य को उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए, आज के समय में भी गहरी चेतावनी देता है। यह विचार हमें बताता है कि लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि न्याय और नैतिकता का संतुलन है।
अहिंसा गांधी के लिए केवल आंदोलन की रणनीति नहीं थी, बल्कि जीवन दर्शन था। वे मानते थे कि हिंसा तात्कालिक परिणाम दे सकती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। संवाद, सहनशीलता और धैर्य ही समाज को आगे ले जाते हैं। आज जब मतभेदों को दुश्मनी में बदला जा रहा है, तब गांधी की अहिंसा हमें यह सिखाती है कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।
आर्थिक दृष्टि से भी गांधी की सोच आज के भारत के लिए महत्वपूर्ण है। चरखा उनके लिए आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा और स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रतीक था। वे चाहते थे कि विकास का लाभ केवल शहरों या कुछ वर्गों तक सीमित न रहे, बल्कि गाँव, किसान, मजदूर और कारीगर भी उसमें बराबरी से शामिल हों। आज जब विकास की परिभाषा पर बहस हो रही है, तब गांधी का समावेशी विकास मॉडल एक संतुलित विकल्प प्रस्तुत करता है।
गणतंत्र दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। गांधी का भारत ऐसा था, जहाँ नागरिक केवल अपने अधिकारों की मांग न करें, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझें। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है, जब नागरिक सजग, संवेदनशील और सक्रिय हों।
आज के भारत के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं—सामाजिक विभाजन, आर्थिक असमानता, राजनीतिक कटुता और नैतिक मूल्यों का क्षरण। ऐसे समय में गांधी को याद करना केवल अतीत की ओर देखने जैसा नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने जैसा है। उनकी सोच हमें यह सिखाती है कि राष्ट्र निर्माण का रास्ता नफरत से नहीं, बल्कि संवाद से निकलता है; डर से नहीं, बल्कि विश्वास से बनता है।
77वें गणतंत्र दिवस पर गांधी की प्रेरणा से आगे बढ़ने का अर्थ है एक ऐसे भारत का निर्माण, जहाँ संविधान केवल किताबों में नहीं, बल्कि व्यवहार में जीवित हो। जहाँ विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत मानी जाए। जहाँ सत्ता सेवा का माध्यम बने और लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन पद्धति हो।

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