जहां सदियों से जल रही है मोक्ष की अग्नि उसे कहते हैं मणिकर्णिका
By Shubh Bhaskar ·
18 Jan 2026 ·
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जहां सदियों से जल रही है मोक्ष की अग्नि उसे कहते हैं मणिकर्णिका
*जन-जन की आवाज कृष्णा पंडित की कलम* ✍🏻
सुनील कुमार मिश्रा दैनिक शुभ भास्कर उत्तर प्रदेश वाराणसी (काशी) का मणिकर्णिका घाट न केवल भारत, बल्कि विश्व के सबसे प्राचीन और निरंतर सक्रिय श्मशान घाटों में गिना जाता है। गंगा तट पर स्थित यह घाट हिंदू आस्था में मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहां देह त्यागने वाले व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
पौराणिक पृष्ठभूमिधार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु के कान की मणि इस स्थान पर गिरने से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार यह स्थान शक्तिपीठ से भी जुड़ा है, जिससे इसकी पवित्रता और अधिक बढ़ जाती है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि स्वयं भगवान शिव यहां प्राण त्यागने वाले को तारक मंत्र प्रदान करते हैं।
हजारों वर्षों से नहीं बुझी चिता की आग इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार मणिकर्णिका घाट पर चिता की अग्नि कभी नहीं बुझी। मुगल काल, ब्रिटिश शासन और स्वतंत्र भारत—हर दौर में यह घाट सक्रिय रहा है। प्रतिदिन सैकड़ों शवों का अंतिम संस्कार यहां किया जाता है।
भूमिकामणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की परंपरा डोम समाज द्वारा निभाई जाती है। यहां चिता की पवित्र अग्नि का अधिकार डोम राजा के पास माना जाता है, जो सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक विशिष्ट व्यवस्था है।
देश-विदेश से आते हैं लोगमोक्ष की कामना लेकर देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर कराने आते हैं। यह घाट आस्था, परंपरा और जीवन के अंतिम सत्य का प्रतीक बन चुका है।
जीवन का आईना है मणिकर्णिकामणिकर्णिका घाट काशी की उस परंपरा का प्रतीक है, जहां मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि यात्रा का पड़ाव माना जाता है। जलती चिताओं के बीच यह घाट हर व्यक्ति को जीवन की क्षणभंगुरता और सत्य का बोध कराता है।
निष्कर्षमणिकर्णिका घाट केवल श्मशान नहीं, बल्कि काशी की आध्यात्मिक पहचान है। यह स्थान सदियों से आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीवंत प्रमाण बना हुआ है