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जयपुर: विदेश में था बेटा तो बेटियों ने निभाया फर्ज, मां की अर्थी को दिया कंधा, किया अंतिम संस्कार

By Shubh Bhaskar · 14 Jul 2026 · 72 views
जयपुर: विदेश में था बेटा तो बेटियों ने निभाया फर्ज, मां की अर्थी को दिया कंधा, किया अंतिम संस्कार



जयपुर:-डीडवाना कुचामन जिले के मकराना में एक ऐसा भावुक और प्रेरणादायक नजारा देखने को मिला, जिसने समाज में बेटियों की भूमिका को लेकर चली आ रही कई पुरानी धारणाओं को चुनौती दी। यहां तीन बेटियों ने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और अंतिम संस्कार किया। गंगानगर निवासी और वर्तमान में मकराना में रह रहे भीम सिंह मौसून की पत्नी आशा देवी सोनी का रविवार देर शाम को आकस्मिक निधन हो गया।
उनका बेटा रोजगार के सिलसिले में विदेश में होने के कारण अंतिम संस्कार में समय पर नहीं पहुंच सका। ऐसे में उनकी तीन बेटियां आगे आईं और अपनी मां की अर्थी को कंधा देकर अंतिम विदाई दी। इस दौरान बेटियों ने न केवल अपने कर्तव्य का निर्वहन किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि माता-पिता के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी का कोई लिंग नहीं होता। इस घटना ने केवल एक परिवार की संवेदनाओं को नहीं, बल्कि समाज के सामने एक नई सोच भी पेश की। वहां उपस्थित लोगों ने बेटियों के इस साहस और संवेदनशीलता की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी, बल्कि अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि बेटियां हर जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं।
अचानक निधन से परिवार में छाया मातम:
रविवार शाम आशा देवी सोनी का आकस्मिक निधन हो गया। निधन की सूचना मिलते ही परिवार और समाज में शोक की लहर दौड़ गई। उनका पुत्र रवि सोनी रोजगार के सिलसिले में विदेश में रह रहा है। सूचना मिलने के बाद भी वह अंतिम संस्कार के समय तक मकराना नहीं पहुंच सका। ऐसे में परिवार की तीनों बेटियां पूनम, पूजा और लक्ष्मी ने सामाजिक परंपराओं की परवाह किए बिना अपनी मां की अंतिम यात्रा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई।
मां की अर्थी को दिया कंधा, निभाया अंतिम फर्ज:
आमतौर पर अंतिम यात्रा में अर्थी को कंधा देने और मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी बेटे या पुरुष परिजनों की मानी जाती रही है, लेकिन इस परिवार में बेटियों ने इस परंपरा को बदलते हुए अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया। तीनों बेटियों के साथ उनके दामाद भी अंतिम यात्रा में शामिल रहे. जब बेटियां अपनी मां की अर्थी लेकर श्मशान की ओर बढ़ीं तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
माता-पिता ने कभी भेदभाव नहीं किया, तो हम क्यों करें':
बेटियों ने कहा कि उनके माता-पिता ने कभी बेटा-बेटी में कोई भेदभाव नहीं किया। उन्हें समान शिक्षा, संस्कार और सम्मान दिया। ऐसे में अंतिम समय में वे अपने कर्तव्य से पीछे कैसे हट सकती थीं। उनका कहना था कि यदि माता-पिता ने जीवनभर बेटियों को समान अधिकार दिए हैं तो अंतिम विदाई का अधिकार भी बेटियों को उतना ही है। श्मशान घाट तक का यह सफर केवल कुछ किलोमीटर का नहीं था, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम भी था। अंतिम यात्रा में मकराना स्वर्णकार समाज सहित विभिन्न समाजों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। सभी ने बेटियों के इस साहसिक निर्णय की सराहना की और इसे समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश बताया।

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