युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को भावभीनी श्रद्धांजलि- *डॉ सुरेश चंद शर्मा*
By Shubh Bhaskar ·
05 Jul 2026 ·
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युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को भावभीनी श्रद्धांजलि- *डॉ सुरेश चंद शर्मा*
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- जयपुर- युवाओं के प्रेरणास्रोत,महान दार्शनिक एवं आध्यात्मिक चिंतक स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर अनको संगठनों पर उच्च पदों से जुड़े *डॉ. शर्मा* ने उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनके विचारों को स्मरण किया।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि प्रतिवर्ष ०4 जुलाई को स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि मनाई जाती है। उन्होंने ०4 जुलाई 1902 को पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में महासमाधि ली थी। स्वामी विवेकानंद ने अपने ओजस्वी विचारों और आध्यात्मिक चिंतन से भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक विरासत को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई। उनका जीवन आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम और मानव सेवा का अनुपम संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व कर भारत का गौरव बढ़ाया। अपने ऐतिहासिक संबोधन की शुरुआत "अमेरिका के भाइयों और बहनों" शब्दों से करते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उनके भाषण का मूल उद्देश्य सार्वभौमिक भाईचारा, धार्मिक सहिष्णुता तथा सभी धर्मों के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता का संदेश देना था।
*डॉ. शर्मा* ने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने धार्मिक कट्टरता और संकीर्णता की कड़ी आलोचना करते हुए "कुएँ के मेंढक" का दृष्टांत प्रस्तुत किया और लोगों को सीमित सोच से बाहर निकलकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सभी धर्म एक ही परम सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हैं, जैसे विभिन्न नदियाँ अंततः समुद्र में मिल जाती हैं। उन्होंने धार्मिक कट्टरता,संकीर्णता और नफरत को समाप्त करने का आह्वान किया तथा "वसुधैव कुटुम्बकम्" को भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र बताया।
उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद का संदेश था—"उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" उनका मानना था कि व्यक्ति को हर परिस्थिति में स्वयं पर विश्वास रखना चाहिए। उन्होंने "दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है" का संदेश देते हुए मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म बताया। साथ ही उन्होंने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और आत्मनिर्भरता का माध्यम माना।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि स्वामी विवेकानंद का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि "दुनिया एक व्यायामशाला है, जहाँ हम स्वयं को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।"
अंत में उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि स्वामी विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी,जब हम उनके आदर्शों—मानव सेवा,चरित्र निर्माण,आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम—को अपने दैनिक जीवन में अपनाएँ।