कबीर- वह युगद्रष्टा जिन्होंने प्रेम, सत्य और मानवता की ज्योति जलाई — *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*
By Shubh Bhaskar ·
30 Jun 2026 ·
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कबीर- वह युगद्रष्टा जिन्होंने प्रेम, सत्य और मानवता की ज्योति जलाई — *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):-जयपुर- संत कबीरदास की जयंती इस वर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा तथा ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 29 जून 2026 को मनाई गई। इस अवसर पर नेशनल क्राइम एंड करप्शन इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (भारत सरकार से पंजीकृत) के राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष व अन्य संगठनों के प्रमुख पदों से जुड़े हुए *डॉ. सुरेश चंद शर्मा* ने संत कबीरदास को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संगठनों से जुड़े हुए राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी नागपाल शर्मा माचाड़ी को बताते हुए कहा कि कबीर ऐसे युगद्रष्टा संत थे, जिन्होंने सत्य, प्रेम, समानता और मानवता की अलख जगाई।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि संत कबीरदास ने अपने जीवनकाल में अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड, जाति-पांति, ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव का प्रखर विरोध किया। उन्होंने समरसता और सौहार्द पर आधारित समाज की स्थापना का संदेश दिया। कबीर का मानना था कि ईश्वर एक है, चाहे उसे राम कहें या रहीम। उन्होंने बाहरी आडंबरों और मूर्तिपूजा की अपेक्षा आंतरिक श्रद्धा, सच्चे मन और प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताया।
उन्होंने कबीर के प्रसिद्ध कथन "काबा फिर काशी भया, राम ही भया रहीम" का उल्लेख करते हुए कहा कि जब धार्मिक कट्टरता समाप्त होती है, तब सभी धर्मों का सार एक ही दिखाई देता है। कबीर के दोहों में मानवता, समरसता, प्रेम और ज्ञान का अद्भुत संदेश निहित है। उनका मानना था कि केवल पुस्तकों का अध्ययन मनुष्य को ज्ञानी नहीं बनाता, बल्कि प्रेम का एक अक्षर समझ लेने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है।
*डॉ. शर्मा* ने बताया कि कबीर ने अहंकार त्यागने, मधुर वाणी बोलने तथा ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकार करने का संदेश दिया। उनका प्रसिद्ध पद "मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में" आज भी आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागृति की प्रेरणा देता है। गुरु की महिमा बताते हुए कबीर ने गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना, क्योंकि गुरु ही अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य का मार्ग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि कबीर ने कर्म और समय के महत्व पर विशेष बल दिया। उनका प्रसिद्ध दोहा "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब" आज भी समय प्रबंधन और कार्य के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है।
तनाव, अहंकार और लालच से मुक्ति का संदेश देते हुए डॉ. शर्मा ने कबीर का दोहा "साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय" उद्धृत किया और कहा कि संतोष ही मानसिक शांति का आधार है। वहीं "ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय" के माध्यम से उन्होंने मधुर व्यवहार और सकारात्मक संवाद की आवश्यकता बताई।
आत्मविश्लेषण के महत्व पर कबीर के प्रसिद्ध दोहे "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय" का उल्लेख करते हुए *डॉ. शर्मा* ने कहा कि दूसरों की कमियां खोजने से पहले स्वयं का मूल्यांकन करना ही सच्चे नेतृत्व और श्रेष्ठ व्यक्तित्व की पहचान है।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि कबीर के दार्शनिक विचार सत्य, मानवता, सरल जीवन और आंतरिक शुद्धता पर आधारित हैं। उन्होंने जातिगत भेदभाव, छुआछूत, धार्मिक पाखंड और अंधविश्वासों का विरोध करते हुए सदाचार और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाया।
उन्होंने कबीर के प्रसिद्ध दोहे "माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे; एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे" का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दोहा मनुष्य को जीवन की नश्वरता का बोध कराता है और अहंकार त्यागने की प्रेरणा देता है।
अंत में *डॉ. सुरेश चंद शर्मा* ने महान समाज सुधारक संत कबीरदास को कोटि-कोटि नमन करते हुए कहा कि यदि हम उनके विचारों को अपने दैनिक जीवन में अपनाएं, तो समाज से कुरीतियों, भेदभाव और अहंकार का अंत कर समरस, शांतिपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण किया जा सकता है।