जूस की दुकानों की | नियमित जांच जरूरी*
By Shubh Bhaskar ·
10 Jun 2026 ·
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*जूस की दुकानों की | नियमित जांच जरूरी*
*:- नरेश सोनी*
गर्मी का मौसम आते ही जूस की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ जाती है। तेज धूप और बढ़ते तापमान के बीच लोग ताजगी, ऊर्जा और स्वास्थ्य की उम्मीद में फलों का रस पीते हैं। जूस को प्राकृतिक पेय माना जाता है, जो शरीर को पोषण और ठंडक प्रदान करता है। लेकिन जब इसी जूस की गुणवत्ता और शुद्धता पर सवाल उठने लगें, तब यह केवल स्वाद का नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर विषय बन जाता है। इसलिए जूस की दुकानों की नियमित जांच होना जरूरी है बाजार में बढ़ती मांग के साथ कुछ मुनाफाखोर तत्व भी सक्रिय हो जाते हैं। अधिक लाभ कमाने की चाह में सड़े-गले फल, दूषित पानी, कृत्रिम रंग, रासायनिक फ्लेवर और अन्य संदिग्ध पदार्थों का उपयोग किया जाता है। कई बार खराब फलों को काट-छांटकर जूस में मिला दिया जाता है ताकि नुकसान से बचाया जा सके। चंद सिक्कों के लालच में कुछ लोग यह भूल जाते हैं कि उनके द्वारा बेचा गया एक गिलास जूस किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार दूषित और अस्वच्छ परिस्थितियों में तैयार जूस से फूड पॉइजनिंग, उल्टी-दस्त, पेट के संक्रमण, टायफाइड, पीलिया, हैजा तथा अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह जोखिम और अधिक गंभीर हो जाता है। स्वास्थ्य के नाम पर यदि बीमारी परोसी जाने लगे तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। आंकड़े बताते हैं कि समस्या छोटी नहीं है। भारत में वर्ष 2009 से 2018 के बीच खाद्य जनित बीमारियों के 2,688 प्रकोप दर्ज किए गए, जिनसे 1 लाख 53 हजार 745 लोग प्रभावित हुए और 572 लोगों की मृत्यु हुई। औसतन हर वर्ष 269 प्रकोप, 15 हजार से अधिक बीमारी के मामले तथा लगभग 57 मौतें दर्ज की गईं। यद्यपि केवल मिलावटी जूस से हुई मौतों का अलग राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, फिर भी ये तथ्य स्पष्ट करते हैं कि दूषित और असुरक्षित खाद्य पदार्थ जनस्वास्थ्य के लिए कितना बड़ा खतरा बने हुए हैं। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि नियंत्रण विभाग, खाद्य सुरक्षा अधिकारियों तथा स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे नियमित निरीक्षण करें, जूस की दुकानों से नमूने लें और आवश्यकतानुसार प्रयोगशाला जांच कराएं। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। केवल मौसमी अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष प्रभावी निगरानी आवश्यक है। साथ ही आम नागरिकों को भी जागरूक रहना होगा। गंदगी, संदिग्ध गुणवत्ता या मिलावट की आशंका होने पर संबंधित विभाग को शिकायत करनी चाहिए। जागरूक उपभोक्ता ही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं। चंद सिक्कों की खनक के लिए यदि कोई दूसरे के खून में जहर घोलने पर उतर आए, तो यह व्यापार नहीं, मानवता के खिलाफ अपराध है। सड़े-गले फलों और मिलावट से तैयार जूस केवल मुनाफा नहीं कमाते, वे अस्पतालों की कतारें भी बढ़ाते हैं। जनता जूस में स्वाद के साथ विश्वास भी खरीदती है, लेकिन मिलावटखोर उसी विश्वास को सबसे पहले छलनी करते हैं। यदि समय रहते ऐसी प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो लोगों का खाद्य सुरक्षा व्यवस्था से भरोसा कमजोर होगा और जनस्वास्थ्य पर खतरा बढ़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि जूस की दुकानों की नियमित जांच को औपचारिकता नहीं, बल्कि
जनहित का महत्वपूर्ण दायित्व माना जाए। लोगों के हाथ में पहुंचने वाला हर गिलास जूस भरोसे, स्वच्छता और गुणवत्ता का प्रतीक होना चाहिए। यही स्वस्थ समाज और जिम्मेदार प्रशासन की पहचान है।