अरावली पर्वत श्रृंखला '' हमारी अमूल्य धरोहर-सुशानी कविया
By Shubh Bhaskar ·
25 Dec 2025 ·
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''अरावली पर्वत श्रृंखला '' हमारी अमूल्य धरोहर-सुशानी कविया
विशाखा व्यास/दैनिक शुभ भास्कर/राजस्थान/उदयपुर
जब मैं कोई पौधा लगाती हूँ,और उसके प्राकृतिक रूप से गिरने से पहले अगर उसका एक भी पत्ता टूट जाता है तो मुझे बहुत बुरा लगता है यह सोचकर कि किसी ने उसे क्यों तोड़ा.100 मीटर से कम ऊँची पहाड़ी कोई साधारण पहाड़ी नहीं है,किसी की कीमत या उपयोगिता उसकी ऊँचाई पर निर्भर नहीं करती। अरावली श्रृंखला की 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों के बारे में देश की सबसे बड़ी न्यायपीठ द्वारा लिया गया फैसला बहुत असंवेदनशील और भावनात्मक रूप से दुख पहुँचाने वाला है।
अरावली शृंखला की हर पहाड़ी हमारी इतनी सारी प्राचीन कहानियों का सार हैं की जब भी मैं रोज़ अपनी बालकनी से उन्हें देखती हूँ,तो मुझे बहुत शांति और गर्व महसूस होता है इन्हें देख के ये हरे-भरे पहाड़ कुछ बहुत बड़े,कुछ मध्यम आकार के और कुछ शायद सिर्फ़ 100 मीटर ऊँचे. हमें हमारे गौरवशाली और उन्नत इतिहास की याद दिलाते हैं.
हमारी धार्मिक,ऐतिहासिक,सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान इन अरावली पहाड़ों से जुड़ी हुई है,जब भी मैं अरावली श्रृंखला की कोई भी चोटी देखती हूँ,भले ही वह सिर्फ़ 100 मीटर ऊँची हो,मेरे अंदर एक गहरा सम्मान का भाव जागता है जो पृथ्वी की नवीन रचना के समय से हमारे साथ अटल और स्थायी है,यह सिर्फ़ एक विरासत नहीं है बल्कि एक पूजनीय संपत्ति है और इसे किसी भी कीमत पर नष्ट नहीं होने देना चाहिए।
हमें ऐसे विकास और औद्योगीकरण की ज़रूरत नहीं है जो हमारी प्राचीन हस्ती को मिटा दे।
फैक्ट्रियां और घर बहुत सारे बनाए जा सकते हैं लेकिन अरावली श्रृंखला को कभी भी दोबारा नहीं बनाया जा सकता,अगर अब इसकी रक्षा नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं की जिस प्रकार हम आज राजस्थान के भौगोलिक इतिहास में पढ़ते हैं कि कालांतर में पश्चिमी राजस्थान में कभी समुद्र था जो बाद में कुछ भौगोलिक बदलावों के कारण अब रेगिस्तान में बदल गया हैं और वो बदलाव तो फिर भी प्राकृतिक कारणों से हुआ था यहाँ तो मानव द्वारा ऐसी स्थिति बनाई जा रही है कि भविष्य में राजस्थान के भौगोलिक इतिहास में हम पढ़ेंगे कि राजस्थान के आधे हिस्से में कभी समुद्र था जहाँ अब रेगिस्तान है,और दूसरे आधे हिस्से में 'दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला' अरावली थी जो औद्योगीकरण का शिकार हो गई जहाँ कभी हर भरा चमन था, जिसका परिणाम है यहाँ का नवीन रेगिस्तान,मतलब पश्चिमी राजस्थान की स्थिति पूरे राजस्थान राज्य की स्थिति बन सकती है।
आजकल सुप्रीम कोर्ट कुछ फैसले संवैधानिक सीमाओं से परे सुनाने लगी हैं,अरावली पर्वत श्रृंखला के बारे में लिया गया फैसला असंवैधानिक है,संविधान किसी भी भौगोलिक स्थिति को नहीं बदल सकता,धरती,अंबर,वायु,जल,अगन इन पांच तत्वों पर संविधान का कोई अधिकार नहीं है l प्राचीन मान्यताओं के अनुसार अनगिनत युगों पहले नवीन पृथ्वी के निर्माण के समय ब्रह्मा पुत्र ऋषि वशिष्ठ जो भगवान राम के गुरु भी थे ने पहाड़ों की कमी,प्राकृतिक आवश्यकता और वनस्पति की ज़रूरत के कारण राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला की स्थापना की थी,इसका प्रमाण अरावली श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर है जहाँ वशिष्ठ का आश्रम स्थित है और जहाँ भगवान राम ने शिक्षा प्राप्त की थी,आधुनिक विज्ञान भी इस बात से इनकार नहीं करता कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है,अरावली भारत में हिमालय का पिता और विश्व की सभी पर्वत श्रृंखलाओं का पूर्वज है,इसका संरक्षण दुनिया की किसी भी अन्य विरासत से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
विचार करने वाली बात यह है कि अगर नवीन पृथ्वी के निर्माण के समय राजस्थान की भूमि के लिए अरावली इतनी ज़रूरी थी तो आज इसका संरक्षण और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
पृथ्वी पर सभी भौगोलिक विशेषताएँ या तो इसका श्रृंगार हैं या इसकी संतानें,एक स्त्री के लिए उसका श्रृंगार और उसकी संतानें उसे अत्यंत प्रिय होती हैं,अगर दोनों उससे छीन लिए जाएँ, तो एक स्त्री के लिए इससे बड़ी पीड़ा कोई नहीं हो सकती,हम भी इस पृथ्वी का एक अंश हैं,जिसे हम धरती माँ कहते हैं उसकी संतान होने के नाते यह हमारा कर्तव्य है कि हम धरती माँ के साथ कोई अन्याय न होने दे ,एक भी पहाड़ी का एक मीटर भी नहीं काटा जाना चाहिए 100 मीटर से कम ऊँची पहाड़ी की तो बात ही छोड़िए यह पृथ्वी का श्रृंगार है। 14वीं सदी में, मां भगवती करणी जी ने भविष्य को देखते हुए प्रकृति की रक्षा और जानवरों और मनुष्यों के कल्याण के लिए बीकानेर क्षेत्र में 10,000 बीघा ज़मीन को 'ओरण' (पवित्र उपवन) के रूप में स्थापित किया था उस समय और कितने ही गाँवों में हमारे पूर्वजों ने प्रकृति की रक्षा के लिए इतना कुछ किया है वनों को संरक्षित किया है।
जब एक स्त्री अमृता देवी एक खेजड़ी के पेड़ के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे सकती है तो अब तो मामला पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़ा है,जिस तरह 1730 में अमृता देवी के बलिदान से प्रेरित होकर 363 बिश्नोईयों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था तो अब तो बात अरावली की हर एक चोटी पर अनगिनत पेड़ों के संरक्षण की हैं चाहे वो पहाड़ियां 100मीटर से ऊपर हो या नीचे न्याय तो न्याय होता है,अगर ढाई सौ साल पहले के लोग प्रकृति के बारे में इतने जागरूक थे तो अब तो 2026 है, प्रकृति को पहले से कहीं ज़्यादा सुरक्षा की ज़रूरत है अब।
ऐसा माना जाता है कि कोर्ट भावनाओं में आकर फैसले नहीं लेती इसलिए प्रैक्टिकली बात करें तो अरावली रेंज की हर पहाड़ी को काटना यहां तक कि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को भी इसका मतलब है जानवरों,पक्षियों और दूसरे जीवों सहित सभी तरह के जीवित प्राणियों को संरक्षण से बाहर करना,ये अरावली पहाड़ पौधों के संसाधनों का खजाना छिपाए हुए हैं जो राजस्थान के लिए जीवन रेखा हैं,पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजन देते हैं जिस पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है,प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं और जलवायु को नियंत्रित करते हैं,आर्थिक रूप से भी फायदेमंद हैं,लकड़ी,फल,कई तरह के औषधीय पौधे और जंगल के कई दूसरे संसाधन देते हैं,
वे हमें रेगिस्तान,सूखे और अकाल से बचाते हैं,अरावली रेंज कई तरह के वन्यजीवों के लिए एक अभयारण्य भी है। अरावली रेंज में किसी भी ऊंचाई की पहाड़ी को काटने का मतलब है राजस्थान के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ना,उन पांच तत्वों का संतुलन बिगाड़ना जो मानव जीवन की नींव हैं। एक फैक्ट्री लगाने के लिए आप मानव जीवन को खतरे में डाल रहे हैं,कई तरह के वन्यजीवों का घर छीन रहे हैं,और कई तरह के पौधों की ज़िंदगी को खत्म कर रहे हैं। नए निर्माण के लिए किसी के अस्तित्व को खत्म करना हत्या के बराबर है,इस तरह के विकास से किस तरह की तरक्की होगी,औद्योगीकरण जो प्रकृति को नष्ट करता है, इसका मतलब है कि प्रकृति भी बदले में उस जगह को आखिरकार नष्ट कर ही देगी क्योंकि प्रकृति कोई साधारण नहीं। अरावली रेंज में आने वाली हर 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों में भी जैव विविधता का एक समृद्ध और सुंदर भंडार है और हमें इसकी रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए भले ही इसके लिए अमृता देवी के नक्शेकदम पर चलना पड़े।