नशेड़ी तोते, खेत में से चुराते हैं , अफीम का फल
By Shubh Bhaskar ·
26 Feb 2026 ·
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नशेड़ी तोते, खेत में से चुराते हैं , अफीम का फल
नशेड़ी तोते, खेत में से चुराते हैं , अफीम का फल
दैनिक शुभ भास्कर राजस्थान चित्तौड़गढ़ कैलाश चंद्र सेरसिया
चित्तौड़गढ़ जिला अफीम उत्पादक क्षेत्र होकर बड़े पैमाने पर बुवाई होती है, अच्छी खासी संख्या में किसान अफीम की खेती करते नजर आते हैं । इसकी खेती के लिए किसानों को बकायदा केंद्रीय नारकोटिक्स विभाग से लाइसेंस लेना होता है । किसान नारकोटिक्स विभाग की देखरेख में ही इस फसल को उगा सकते हैं । जिले के अफीम के खेतों में एक अनोखी समस्या देखने को मिलती है-तोते । भदेसर तहसील के किसान मुकेश कुमार रेगर बताते हैं कि यहां के तोते अफीम के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें मजाक में 'नशेड़ी तोते' कहा जाने लगा है. जब किसान अफीम के डोडों में चीरा लगाते हैं, उसी समय तोते सबसे ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं. वे या तो डोडों को काटकर ले जाते हैं या फिर उनमें से निकलने वाला दूध पी जाते हैं. कई बार अधिक नशे की हालत में तोते पेड़ों से गिर जाते हैं या उड़ते समय दिशा भटक बैठते हैं । यह नजारा किसानों के लिए एक बड़ी परेशानी के साथ-साथ अजीब अनुभव भी होता है । दरअसल तोते मिर्ची के अलावा अफीम खाने लगे हैं । जिसकी वजह से किसानों को फसल के नुकसान का डर सता रहा है । यहां डोडा से अफीम निकालने का काम चल रहा है। लेकिन इस बीच किसानों को अफीमची तोतों ने खासा परेशान कर रखा है, जो खेत में से अफीम चुराकर खा जाते हैं संसदीय क्षेत्र में लगभग 22 हजार से अधिक किसान अफीम के पट्टा धारक हैं । जिले की
चित्तौड़गढ़, भदेसर, कपासन , भुपाल सागर, डूंगला, गंगरार, राशमी, निंबाहेड़ा , बड़ी सादड़ी, बेगू, रावतभाटा तहसीलों में ईन दिनों अफीम की खेती यौवन पर है, डोडो पर चीरा लगा लुवाई की जा रही है । अफीम की फसल को अपने बच्चों की तरह पालने वाले किसान रात दिन सुरक्षा को लेकर चिंतित है , हालत यह है कि किसान अपने सारे जरूरी काम छोड़कर खेतों की सुरक्षा में लगे हुए हैं अंधेरी रात भी आंखों में निकल जाती है , अफीम की फसल से डोडे चोरी व नुकसान की आशंका में किसान दिन रात खेतों पर डेरा डाले हुए हैं। अफीम की खेती का सबसे महत्वपूर्ण चरण चीरा लगाने और दूध निकालने का होता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘लुआई-चुआई’ कहा जाता है. दोपहर के बाद किसान विशेष औजार से डोडों पर हल्का चीरा लगाते हैं । इसके बाद रात भर डोडों से दूध (Latex) रिसता रहता है । अगले दिन अल सुबह सूरज निकलने से पहले इस दूध को सावधानी से इकट्ठा कर लिया जाता है । यही वह समय होता है जब तोते और अन्य पक्षी सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं और अफीम को नुकसान पहुंचाते हैं । इस दौरान खेतों की निगरानी और सुरक्षा बेहद जरूरी हो जाती है ।अफीम के डोडो को तोते तथा नीलगाय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। इससे बचने के लिए किसान अब जाल लगाने लगाने लगे हैं।
अफीम की फसल को अपने बच्चों की तरह पालने वाले किसान रात दिन सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
हालात यह है कि किसान अपने सारे जरूरी काम छोड़ कर खेतों की सुरक्षा में लगे हुए हैं। अंधेरी रात भी आंखों में निकल जाती है। अफीम की फसल से डोडे चोरी व नुकसान की आशंका में किसान दिन रात खेतों पर डेरा डाले हुए हैं।
अफीम क्या होती है?
अफीम एक प्रकार की पौधा होता है। इस पौधे के कच्चे डोडे को चीरने के बाद दूध जैसा पदार्थ निकलता है। फिर इस दूध को सुखाकर अफीम बनाई जाती है। इस अफीम का इस्तेमाल कानूनी तौर पर दर्द निवारक दवाओं के निर्माण में किया जाता है।
भारत में अफीम की खेती वही किसान कर सकता है, जिसे केंद्र सरकार की तरफ से खेती करने का लाइसेंस मिला हो। अवैध अफीम की फसल पूरी तरह से गैर-कानूनी है। भारत में अफीम की खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में की जाती है।
तोतों से बचने के लिए किसान अपना रहे ये तरीका
प्लास्टिक की नेट लगाने से अफीम की फसल को पहले के मुकाबले कम नुकसान होने लगा है । पहले तोते भारी मात्रा में अफीम के डोडे अपनी चोंच में लेकर उड़ जाते थे । अब प्लास्टिक नेट लगने से ऐसे तोतों की संख्या कम हुई है। इन सबके अलावा नीलगायों का खतरा भी अफीम की खेती पर मंडरा रहा है ।
बीमारी हो या विवाह, खेत पर ही निकलता समय
इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दिनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।
बीमारी हो तो अभी परिवार के सदस्य का खेत पर रहना जरूरी हो जाता है। चित्तौड़ के निकट कन्नोज निवासी रवि कुमार सोलिया ने बताया कि उसके परिवार में विवाह समारोह है । लेकिन अफीम की चिंता उन्हें हर समय रहती है। ऐसे में उन्हें या परिवार का सदस्य खेत पर जरूर मिलता है। वहीं दूसरी तरफ विवाह समारोह की रस्में भी जारी है।
खेत पर ही चल रहा किसानों का चूल्हा
इधर, जानकारी में सामने आया कि अफीम की खेती में किसान का पूरा परिवार लगता है। करीब 2 महीने तक किसानों का पूरा परिवार खेत पर ही रहता है। यहां तक चूल्हा भी खेत पर ही जलता है। परिवार के सभी सदस्यों का खाना खेत पर ही बन रहा है।
जीवनरक्षक दवाओं से लेकर बनते हैं ड्रग्स
अफीम से निकलने वाले मॉर्फिन से जीवनरक्षक दवाएं बनती हैं। आम आदमी इसके खेतों में जाए तो इसकी महक से ही मदहोश हो सकता है। वहीं अफीम का लोग नशे के रूप में दुरुपयोग करते हैं। क्योंकि अफीम के डोडा (फल) से अफीम के अलावा पोस्ता-दाना भी निकलता है। साथ ही डोडे का छिलका जिसमें भी नशीला पदार्थ होता है, जिसको गलाकर पानी निकाला जाता है। इसमें भी नशा होता है, जिसका हाइवे पर निकलने वाले ट्रक ड्राइवर नशे के लिए सेवन करते हैं। इसलिए जिले में अफीम तस्करी के कई मामलों में NDPS एक्ट के तहत हजारों तस्कर देश की कई जेलों में बंद हैं और सजा काट रहे हैं। इसके दुरुपयोग में तस्कर कई जहरीले पदार्थ (ड्रग्स) को बनाने में उपयोग करते हैं।
राजस्थान में अफीम की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि परंपरा, अनुशासन और कड़ी मेहनत का प्रतीक है । मौसम की मार, जंगली जीवों का खतरा, तोतों और चूहों की समस्या-इन सबके बावजूद किसान हर साल इस चुनौतीपूर्ण फसल को उगाते हैं ।