लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश एक सियासी मज़ाक के सिवा कुछ नहीं
By Shubh Bhaskar ·
11 Feb 2026 ·
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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश एक सियासी मज़ाक के सिवा कुछ नहीं
लोकसभा में विपक्ष ने तोड़ी सारी मर्यादा
देश देख भी रहा जनता समझ रही है
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सुनील कुमार मिश्रा (बद्री) दैनिक शुभ भास्कर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कई पार्टियों के नेता हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं। इस पर मेरी राय है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ऐसा किया तो जा सकता है मगर प्रस्ताव पारित किए जाना फ़िलहाल तो संख्याबल की दृष्टि से संभव ही नहीं है और फिर जिन मुद्दों को लेकर ऐसा किया जा रहा है वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है।
सच पूछो तो ओम बिड़ला के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव जिन मुद्दों पर लाया जाना प्रचारित किया जा रहा है वह किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं।
लोकतंत्र का आसन, तमाशे का अखाड़ा नहीं होता। ओम बिड़ला के पक्ष में साफ़-साफ़ बात यह है कि लोकसभा का स्पीकर कोई पार्टी प्रवक्ता नहीं होता, न ही वह विपक्ष या सत्ता का एजेंट होता है। वह सदन की रीढ़ होता है। नियम, मर्यादा और परंपरा का संरक्षक। इसी कसौटी पर यदि ओम बिड़ला को परखा जाए, तो विरोध की मौजूदा पटकथा बौनी और बनावटी नज़र आती है।
मेरी दृष्टि में प्रस्ताव लाने का अधिकार संविधान देता है, लेकिन अधिकार का अर्थ यह नहीं कि हर बार सदन को सड़कछाप शोर में बदल दिया जाए और फिर स्पीकर को कटघरे में खड़ा कर दिया जाए।
अनुच्छेद 94-सी का हवाला देकर जिस तरह “हटाने” का शोर रचा जा रहा है, वह संवैधानिक विवेक नहीं, बल्कि राजनीतिक अधीरता का प्रदर्शन है। संख्या-बल का सच सबके सामने है; यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता और यही बात इसे और ज़्यादा संदिग्ध बनाती है। जब परिणाम पहले से तय हो, तब प्रस्ताव लोकतंत्र का औज़ार नहीं, सुर्ख़ियों का हथियार बन जाता है।
सवाल यह नहीं है कि प्रस्ताव लाया जा सकता है या नहीं सवाल यह है कि क्यों लाया जा रहा है सदन में नियम तोड़े जाएँ! आसन की गरिमा को चुनौती दी जाए! माइक और मेज़ को प्रतीकात्मक दुश्मन मानकर प्रदर्शन किया जाए! और फिर स्पीकर से अपेक्षा की जाए कि वह “निष्पक्षता” के नाम पर आँख मूँद ले—यह तर्क नहीं, दबाव की राजनीति है। लोकतंत्र में स्पीकर की निष्पक्षता का अर्थ अराजकता के सामने समर्पण नहीं होता।
आरोप लगाया जाता है कि विपक्ष को बोलने नहीं दिया गया। पर सच यह है कि बोलने का अधिकार नियमों के भीतर होता है, हंगामे के भीतर नहीं। अध्यक्ष का दायित्व है कि वह सदन चलाए, न कि उसे चलने न दे। जब चेतावनियों के बाद भी मर्यादा टूटे, तो कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है—वरना स्पीकर का आसन रबर-स्टैम्प बनकर रह जाएगा। यह कार्रवाई किसी दल के खिलाफ़ नहीं, अव्यवस्था के खिलाफ़ होती है।
इतिहास गवाह है इससे पहले भी स्पीकरों के खिलाफ़ ऐसे प्रस्ताव आए, पर वे असफल रहे। कारण साफ़ है कि स्पीकर का काम फ़ैसलों से अधिक प्रक्रिया का पालन है। ओम बिड़ला ने उसी प्रक्रिया का पालन किया है । न कम, न ज़्यादा। यही बात सत्तारूढ़ पक्ष ही नहीं, संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने भी कही है, जिनमें किरण रिजिजू का बयान भी शामिल है।
दरअसल, समस्या स्पीकर नहीं, राजनीति का बदला हुआ मिज़ाज है! जहाँ हार का ग़ुस्सा नियमों पर निकाला जाता है।
राहुल गांधी और विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए कि संसद में शोर से विश्वसनीयता बढ़ती है या तर्क से। स्पीकर को निशाना बनाकर लोकतंत्र को मजबूत नहीं किया जाता बल्कि उसे कमज़ोर किया जाता है।
यहाँ मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि ओम बिड़ला पर यह हमला संवैधानिक चिंता नहीं, राजनीतिक कुलबुलाहट का परिणाम है। स्पीकर का आसन बचेगा क्योंकि वह नियमों पर खड़ा है। और नियमों पर खड़ी कुर्सियाँ, शोर से नहीं गिरतीं।