कलम के सिपाही: जहाँ मौत का खौफ, पत्रकारिता के जुनून से हार जाता है।
By Shubh Bhaskar ·
09 Feb 2026 ·
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कलम के सिपाही: जहाँ मौत का खौफ, पत्रकारिता के जुनून से हार जाता है।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):-अलवर- कलम के सिपाही जहां मौत का खौफ, पत्रकारिता के जुनून से हार जाता है।
कहते हैं दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—
एक वे, जो इतिहास पढ़ते हैं…
और दूसरे वे, जो इतिहास गढ़ते हैं।
लेकिन इन दोनों के बीच एक तीसरी जमात भी है,
जो इतिहास को अपनी आँखों से देखती है,
सच को अपनी कलम में कैद करती है,
और जान हथेली पर रखकर उसे दुनिया के सामने रख देती है।
यह जमात है—निडर पत्रकारों की।
शौक नहीं, यह तो शहादत का संकल्प है
“डर मौत का होता तो शौक पत्रकारिता का न होता”
—यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजती वह ललकार है, जो तानाशाहों की नींद उड़ा देती है।
पत्रकारिता कोई मेज-कुर्सी की सुरक्षित नौकरी नहीं है।
यह जलते अंगारों पर नंगे पाँव चलने का साहस है।
जब समाज गहरी नींद में होता है,
तब कोई पत्रकार सरहदों की चीखें रिकॉर्ड कर रहा होता है।
जब व्यवस्था भ्रष्टाचार की रजाई ओढ़कर सोती है,
तब कोई जांबाज़ उस रजाई को फाड़ने की हिम्मत करता है।
सत्य की तलवार और बारूद का पहरा
आज के दौर में सच बोलना सबसे खतरनाक काम बन चुका है।
जहाँ गोलियाँ, धमकियाँ और मुकदमे पत्रकार का पीछा करते हैं,
वहीं उसकी कलम की स्याही
पसीने, आँसुओं और कभी-कभी खून से मिलकर तैयार होती है।
*भ्रष्टाचार का काल सत्ता के रसूखदारों की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछना आसान नहीं होता*।
फाइलों में दबे घोटालों को उजागर करना,
और ताकतवरों की चुप्पी तोड़ना यही वह अपराध है, जिसकी सजा अक्सर पत्रकार भुगतता है।
न्याय की आवाज़
दबे-कुचले लोगों की सिसकियों को
हेडलाइन में बदलना ही असली पत्रकारिता है।
जिस आवाज़ को कोई सुनना नहीं चाहता,
उसे मंच देना ही कलम की असली ताकत है। जोखिम भरा सफर लोकतंत्र के अंतिम प्रहरी
जब लोकतंत्र के बाकी स्तंभ धुंधले पड़ने लगते हैं,
तब पत्रकारिता ही वह मशाल है
जो अंधेरे को चीरती है।
फेक न्यूज़ के इस दौर में,
जहाँ झूठ को सच बनाकर परोसा जा रहा है,
वहाँ सच्चाई के प्रति यह ‘शौक’
समाज की आखिरी उम्मीद बन जाता है।
गौरी लंकेश से लेकर
उन तमाम गुमनाम पत्रकारों तक,
जिन्होंने सत्य की वेदी पर खुद को कुर्बान कर दिया—
उनकी कुर्बानी चीख-चीखकर कहती है:
“सत्य को दबाया जा सकता है, पर दफन नहीं।”
निष्कर्ष
पत्रकारिता का यही जुनून
डर को गौरव में बदल देता है।
यह पेशा सुरक्षित किनारे खोजने वालों के लिए नहीं,
बल्कि उनके लिए है
जिन्हें तूफानों से टकराने का शौक होता है।
उन तमाम कलम के सिपाहियों को सलाम,
जिनकी वजह से आज भी सच ज़िंदा है
और सत्ता के गलियारों में खौफ कायम है।