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रमा एकादशी पर गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने दी ब्रज चौरासी कोस यात्रा की विस्तृत जानकारी।

By Shubh Bhaskar · 30 Jan 2026 · 16 views
रमा एकादशी पर गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने दी ब्रज चौरासी कोस यात्रा की विस्तृत जानकारी।

*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*

(माचाड़ीअलवर):- मथुरा-ब्रजधाम निवासी, ब्रजवासी गौ रक्षक सेना भारत संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं श्री राधे ब्रजवासी गौशाला ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने रमा एकादशी के पावन अवसर पर ब्रज चौरासी कोस यात्रा की महत्ता, इतिहास एवं आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
स्वामी जी ने कहा कि—
“ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा एक देत।
लख चौरासी योनिन के संकट हरिहर लेत॥”
अर्थात ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने से जीव को चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है।
उन्होंने बताया कि एक बार नंदबाबा और यशोदा मैया ने समस्त तीर्थों की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की थी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वे सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लेंगे। श्रीकृष्ण की आज्ञा से समस्त तीर्थ ब्रज में निवास करने लगे। मान्यता है कि ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने वत्स-हरण के पश्चात अपने अपराध की शांति हेतु श्रीकृष्ण के आदेश से की थी। इसी से ब्रज यात्रा का सूत्रपात हुआ।
स्वामी धर्म दास महाराज ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्रनाभ जी, तथा बाद में परम रसिक संत श्री स्वामी हरिदास जी, श्री हरिवंश जी, श्री वल्लभाचार्य जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री चैतन्य महाप्रभु जी जैसे अनेक वैष्णव आचार्यों द्वारा ब्रज यात्रा को व्यापक स्वरूप मिला, जिसे आज भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु करते हैं।
ब्रज शब्द का अर्थ एवं क्षेत्र
स्वामी जी ने बताया कि ब्रज शब्द का अर्थ उस व्यापक परब्रह्म से है जो सत, रज और तम तीनों गुणों से परे है। वेदों में कहा गया है—
“व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रजः”
अर्थात जहाँ गौएँ विचरण करती हैं, वही ब्रज है।
हरिवंश पुराण के अनुसार मथुरा के आसपास का क्षेत्र ब्रज कहलाता है, जिसमें उत्तर प्रदेश का मथुरा जिला, राजस्थान के भरतपुर जिले की डीग व कामां तहसील तथा हरियाणा के फरीदाबाद जिले की होडल तहसील सम्मिलित हैं।
ब्रज की अद्भुत महिमा
स्वामी गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने कहा कि ब्रज भूमि का स्मरण मात्र से हृदय प्रेम-रस से भर उठता है। श्रीकृष्ण के वन-गोचारण से ब्रज की रज का कण-कण कृष्णमय हो गया है। इसी कारण भक्तजन ब्रज रज को मस्तक पर धारण कर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं।
उन्होंने रसखान, सूरदास एवं अन्य संतों के पदों के माध्यम से ब्रज की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि—
“जो सुख ब्रज में एक घरी,
सो सुख तीन लोक में नाहीं।”
यहाँ तक कि स्वयं मुक्ति भी ब्रज रज की आकांक्षा करती है। श्रीमद्भागवत में ब्रह्मा जी और भगवान शंकर द्वारा भी ब्रज में जन्म लेने की कामना का उल्लेख मिलता है।
कार्यक्रम के अंत में स्वामी गौ पुत्र धर्म दास महाराज ने गौ पुत्र यदुवेन्द्र कुमार हिन्दू को ब्रज चौरासी कोस यात्रा से जुड़ी समस्त जानकारी प्रदान की तथा कहा कि यह सब गौ माता की कृपा से संभव है।

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