मनरेगा को बचाओ और वीबी-जी राम जी बिल को खारिज करो: 22 दिसंबर 2025 को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित।
By Shubh Bhaskar ·
20 Dec 2025 ·
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय आह्वान।
मनरेगा को बचाओ और वीबी-जी राम जी बिल को खारिज करो: 22 दिसंबर 2025 को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित।
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- अलवर- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय आह्वान है कि मनरेगा को बचाओ और वीबी-जी राम जी बिल को खारीज करो 22 दिसंबर 2025 को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित होगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की जगह एक नया ग्रामीण रोजगार बिल लाने के कदम का पुरजोर विरोध करती है। इस ऐतिहासिक कानून से महात्मा गांधी के नाम को जानबूझकर हटाना कोई साधारण प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि गहरा फांसीवादी वैचारिक कृत्य है, जो भाजपा की गांधीजी के मूल्यों और विरासत के प्रति घोर अवमानना को उजागर करता है। यह कदम भारत के लोगों को पहले से ही ज्ञात सत्य की पुष्टि करता है कि भाजपा और उसके वैचारिक गुरु वास्तव में गोडसे के सच्चे शिष्य हैं। एक अधिकार-आधारित कानून को तोड़कर इसे विवेकाधीन योजना में बदलकर, सरकार गारंटीकृत रोजगार के विचार को ही कमजोर कर रही है और ग्रामीण मजदूरों को सरकारी कोटे और ठेकेदार-प्रधान तंत्र की दया पर छोड़ रही है।
यूपीए सरकार द्वारा वामपंथ के समर्थन से लागू मनरेगा हमारे गणतंत्र के इतिहास में एक प्रमुख मील का पत्थर है और संवैधानिक रूप से कार्य का अधिकार की अवधारणा की आधारशिला है। यह राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों से सीधे जुड़ा है, जो राज्य को सभी नागरिकों को आजीविका के साधन प्रदान करने का प्रयास करने का आदेश देते हैं। इस अधिनियम ने ग्रामीण भारत में न्यूनतम मजदूरी को संस्थागत रूप दिया और इसके प्रावधानों में कोई कमी ग्रामीण मजदूरों के शोषण को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देगी। जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन शहरी क्षेत्रों तथा शिक्षितों के रोजगार नष्ट कर रहे हैं, ऐसे समय में मनरेगा के दायरे को शहरी क्षेत्रों तक विस्तार करने की जरूरत है, न कि ग्रामीण भारत में इसके दृष्टिकोण और सुरक्षा उपायों को नष्ट करने की।
कागज पर काम के दिनों को सालाना 125 करने का दावा करते हुए भी प्रस्तावित बिल योजना की मांग-आधारित प्रकृति को हटा रहा है, जिससे मजदूरों का रोजगार मांगने का अधिकार छिन जाएगा। इससे मजदूर ठेकेदारों, स्थानीय अधिकारियों और जमींदारों के सामने असुरक्षित हो जाएंगे। मनरेगा ने ग्रामीण मांग को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कई बार भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी के दबाव से बचाया है, विशेष रूप से कोविड संकट के दौरान।
नया बिल वित्तीय बोझ का 40% राज्य सरकारों पर डाल रहा है, जिनमें से कई पहले से ही दोषपूर्ण जीएसटी डिजाइन, केंद्र की उदासीनता और राजनीतिक प्रतिशोध के कारण गंभीर वित्तीय तनाव का सामना कर रही हैं। इतना व्यापक बदलाव बिना व्यापक परामर्श और मजदूरी बढ़ाने तथा गारंटीकृत काम के दिनों पर स्पष्ट फोकस के कभी नहीं लाया जाना चाहिए था। सीपीआई का मानना है कि इस मजदूर-विरोधी और असंवैधानिक कदम का देश भर के मजदूरों और लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा दृढ़ता से प्रतिरोध किया जाएगा।
सीपीआई सभी पार्टी इकाइयों से अपील करती है कि 22 दिसंबर 2025 को सभी जिलों में विरोध प्रदर्शन आयोजित करें। श्रमिक यूनियन के प्रदेश मीडिया प्रभारी नागपाल शर्मा माचाड़ी को यह जानकारी जिला महासचिव तेजपाल सैनी द्वारा दी गई।