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गणगौर पर्व : पारंपरिक रूप से धूमधाम से मनाया गया

By Shubh Bhaskar · 21 Mar 2026 · 30 views
गणगौर पर्व : पारंपरिक रूप से धूमधाम से मनाया गया

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राजस्थान की संस्कृति में कई ऐसे त्योहार हैं जो परंपरा, आस्था और पारिवारिक प्रेम को दर्शाते हैं। जिनमें से एक प्रमुख त्योहार गणगौर है। यह पर्व खासतौर पर महिलाओं और युवतियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। गणगौर का उत्सव राजस्थान में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार वसंत ऋतु में आता है और इसे प्रकृति की नई शुरुआत, खुशहाली, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन महिलाएं माता गौरी और भगवान शिव की पूजा करती हैं और अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं। राजस्थान के गांवों और शहरों में मेले, रंग-बिरंगे आयोजन और पारंपरिक रीतियों के साथ गणगौर उत्सव मनाया जाता है। महिलाएं सज धज कर माता गौरी की मूर्तियों को सजाती हैं। व्रत करती हैं और विशेष भजन, गीत और लोक नृत्य में भाग लेती हैं। यह त्योहार सामाजिक समरसता और पारिवारिक मेलजोल को भी बढ़ावा देता है।

गणगौर क्यों मनाई जाती है

गणगौर का पर्व मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए मनाया जाता है। वहीं अविवाहित लड़कियां इस दिन माता गौरी से अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं। इस दिन माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव (ईसर) की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता गौरी दांपत्य सुख, प्रेम, भक्ति और समृद्धि की प्रतीक मानी जाती हैं, इसलिए यह त्योहार महिलाओं की आस्था और विश्वास के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है।

गणगौर का पौराणिक इतिहास

पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी अटूट श्रद्धा, प्रेम और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी पवित्र प्रेम और समर्पण की याद में गणगौर का त्योहार मनाया जाता है। गण शब्द भगवान शिव के लिए और गौर शब्द माता पार्वती के लिए बोला जाता है। इसलिए इस पर्व को शिव और पार्वती के पवित्र मिलन और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

16 दिनों तक चलता है गणगौर पर्व

गणगौर का पर्व होली के दूसरे दिन से शुरू होकर करीब 16 दिनों तक चलता है। इस दौरान महिलाएं रोजाना माता गणगौर की पूजा करती हैं। घरों में मिट्टी या लकड़ी की ईसर-गौरी की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और उन्हें सजाया जाता है। महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सिर पर कलश या पूजा की थाली लेकर गीत गाते हुए शोभा यात्रा भी निकालती हैं। गणगौर के अवसर पर महिलाएं और युवतियां खास पारंपरिक पहनावा पहनती हैं और पारंपरिक आभूषण पहनकर महिलाएं सोलह शृंगार करती हैं। गांवों और शहरों में गणगौर के गीत गाए जाते हैं और लोकनृत्य भी किए जाते हैं। पूरा वातावरण रंग, संगीत और खुशियों से भर जाता है, जिससे यह त्योहार और भी आकर्षक बन जाता है।

गणगौर का सांस्कृतिक महत्त्व

गणगौर केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। यह त्योहार वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल की खुशहाली को भी दर्शाता है। इस पर्व के माध्यम से परिवार और समाज में प्रेम, सम्मान और सौहार्द का संदेश मिलता है। राजस्थान के कई शहरों में इस दिन गणगौर की भव्य सवारी भी निकाली जाती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। गणगौर का त्योहार चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है, जिसे गौरी तृतीया भी कहा जाता है। इस दिन ईसर और गौरी की मूर्तियों को तालाब, नदी या झील में विसर्जित किया जाता है और इसी के साथ इस उत्सव का समापन होता है। गणगौर प्रेम, आस्था और पारिवारिक सुख का प्रतीक है। राजस्थान में यह पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और इस दिन भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है। इस बार जिले भर में गणगौर पर्व 21 मार्च को गुमनाम से मनाया गया।

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