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कविता ऋतुराज बसंत

By Shubh Bhaskar · 25 Feb 2026 · 62 views
कविता
ऋतुराज बसंत

बसंत का मौसम पतझड़ लेकर आया
रंग बिरंगी माया कोई न समझ पाया
पानी बीत गया खेत खलिहान सुख गए
पेड़ कट गए बसंत का मौसम आया

चारों तरफ हरियाली हो रही
पतझड़ मौसम दिख रहा बसंत का सुहाना मौसम खिल रहा
अब बसंत सिर्फ नाम का रहा

प्यार और प्रेम की भावना नष्ट हो गई
आज की दुनिया बदल गई
पेड़ पौधों में हरियाली नहीं होती है
समय पर वर्षा नहीं होती है

प्रकृति अपना रूप दिखाती है
समय परिवर्तन होता है
मानव मानव का नहीं रह रहा
दुनिया बदल चुकी है

बसंत भी बदल चूका
खेतों में पहली जैसी हरियाली नहीं
होती खाद बीज से फसलें नहीं होती
पानी का भी मिठास बिगाड़ चूका

पानी भी पाताल में जा चूका सुख गई
नदी और तालाब नहीं रहा
पतझड़ पहले जैसा वसंत सुख गए
खेत और खलियान पेड़ पौधे नहीं रहे

नहीं वर्षा समय पर होती नहीं
मानव सबको खा गया
प्रकृति अपना रूप दिखाएगी
फिर से बसंत खिल खिलाएगी

स्वरचित कविता सुरेश धमोरा जयपुर राजस्थान 9001679761

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