पत्रकारिता, आर्थिक स्वावलंबन और सोशल मीडिया का ‘ट्रायल’
By Shubh Bhaskar ·
01 Feb 2026 ·
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पत्रकारिता, आर्थिक स्वावलंबन और सोशल मीडिया का ‘ट्रायल’
*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*
(माचाड़ीअलवर):- जयपुर- सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक पत्रकार द्वारा विज्ञापन की रसीद काटने तथा एक व्यक्ति द्वारा उसे कैमरे में रिकॉर्ड किए जाने का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस घटना ने पत्रकारिता के व्यावसायिक पक्ष और समाज की सार्वजनिक धारणा के बीच गहरे टकराव को उजागर कर दिया है।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया के पास यह क्षमता है कि वह किसी भी व्यक्ति को पलभर में नायक या खलनायक बना दे। हाल के दिनों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जिसमें पत्रकारों द्वारा विज्ञापन की मांग को ‘उगाही’ या ‘फर्जीवाड़ा’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि यह समझना बेहद जरूरी है कि पत्रकारिता केवल एक सेवा या जुनून नहीं, बल्कि एक पेशा भी है, जिसे सुचारू रूप से चलाने के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है।
विज्ञापन : पत्रकारिता की रीढ़
किसी भी समाचार संस्था के संचालन के लिए कागज, बिजली, तकनीकी संसाधन, कार्यालय खर्च और कर्मचारियों के वेतन जैसे अनेक खर्च होते हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति मुख्य रूप से विज्ञापन के माध्यम से ही की जाती है। यदि कोई पत्रकार किसी प्रतिष्ठान से विज्ञापन की मांग करता है और बदले में संस्थान की वैध रसीद तथा अपना आधिकारिक पहचान पत्र प्रस्तुत करता है, तो यह एक पूरी तरह से कानूनी और व्यावसायिक प्रक्रिया है। ऐसे में इसे ‘फर्जीवाड़ा’ कहना न केवल पत्रकार के आत्मसम्मान पर आघात है, बल्कि संबंधित मीडिया संस्था की साख को भी ठेस पहुँचाता है।
सोशल मीडिया का दुरुपयोग और मानहानि
विडंबना यह है कि कई बार कुछ लोग बिना पूरी सच्चाई जाने या केवल सनसनी फैलाने के उद्देश्य से पत्रकारों के वीडियो रिकॉर्ड कर उन्हें सोशल मीडिया पर ‘फर्जी’ बताकर वायरल कर देते हैं। भारतीय नागरिक संहिता (BNS) की धारा 356 के अनुसार, बिना प्रमाण किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना मानहानि के अंतर्गत आता है और यह दंडनीय अपराध है।
जो पत्रकार दिन-रात जनता की समस्याओं को सामने लाने का कार्य करता है, उसे केवल अपनी आजीविका और संस्था के संचालन के लिए किए जा रहे वैध प्रयासों के कारण अपमानित करना न केवल अनुचित है, बल्कि नैतिक रूप से भी गलत है।
विश्वास ही लोकतंत्र की ताकत
पत्रकार और समाज के बीच आपसी विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई पत्रकार पारदर्शिता के साथ विज्ञापन की प्रक्रिया अपनाता है, तो उसे संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। समाज को ‘वायरल संस्कृति’ के प्रभाव में बहकर निर्णय लेने के बजाय तथ्यों और सच्चाई के आधार पर किसी को सम्मान या अपमान देने का विवेक अपनाना चाहिए।
किसी पत्रकार की मानहानि करना केवल एक व्यक्ति को चोट पहुँचाना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने जैसा है। जिम्मेदार समाज और जिम्मेदार सोशल मीडिया ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।